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अगरहो प्यार के मौसम तो हमभी प्यार लिखेगें,खनकतीरेशमी पाजेबकी झंकारलिखेंगे

मगर जब खून से खेले मजहबीताकतें तब हम,पिलाकर लेखनीको खून हम अंगारलिखेगें

Friday, August 18, 2017

आपके आशीर्वाद के साथ पुनरागमन

सादर प्रणाम
लगभग २ वर्षों बाद एक बार फिर से ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रख रहा हूँ.ये सच है की जिंदगी जीने की जद्दोज़हद में आपको कभी कभी अपनी सबसे प्यारी इच्छाओं की आहुति देनी पड़ती है.ये बीते हुए २ साल शायद उन्ही में से एक हैं. कैंसर जैसे जानलेवा बिमारी को हारने के बाद और अपने आप को दाल रोटी चलाने के योग्य बनाने के बाद एक बार फिर कलम ने आग उगलने की ठानी है. फिर से गद्दारों को गद्दार कहने और सच्चाई से लोगों को रूबरू कराने की कोशिश शुरू करने जा रहा हूँ. आप सभी बड़ों और छोटों के आशीर्वाद से ही यह संभव हो सकता है. अपना आशीष दें.
जय माँ भारती. वन्देमातरम.

Tuesday, July 7, 2015

अराजकता,अलगाववाद और अरविन्द केजरीवाल

आखिर क्या है केजरीवाल और कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मालिक की दोस्ती का राज?

केजरीवाल की यासीन मलिक से दोस्ती लगभग वर्षों पुरानी है। केजरीवाल जब से नौकरी छोड़कर एनजीओ चला रहे हैं तभी से दोनों की दोस्ती जगविदित है।यासीन मालिक घाटी में केजरीवाल के एनजीओ का काम देखता था।(हलाकि तब उसकी पहचान एक अलगाववादी के रूप में नहीं थी) बाद में यासीन एक बड़ा अलगाववादी नेता बन गया और कश्मीर में रेफरेंडम कराकर कश्मीर का विलय पाकिस्तान में कराने की मांग करने लगा।हलाकि यह असम्बैधानिक था इसलिए इन मांगों को भारत की सभी सरकारों द्वारा ठुकरा दिया गया।भारत का सबिधान एक संघीय व्यवस्था को ही सपोर्ट करता है इसलिए चुनाव के आलावा ऐसा कोई अलग विधान नहीं है जो किसी भी राज्य सरकार को रेफरेंडम कराने का अधिकार देता हो।केजरी-यासीन की दोस्ती की प्रगाढ़ता उस समय देखने को मिली जब यासीन मालिक ने खुलेआम दिल्ली के 14 पर्सेंट मुसलमानो को आम आदमी पार्टी को वोट देने को कहा। इसका फायदा केजरीवाल को हुआ और बीजेपी पिछले चुनावों से ज्यादा वोट पाने के बावजूद एकजुट मुस्लिम वोटों की वज़ह से केजरीवाल ने बम्पर जीत दर्ज़ की।दिल्ली के साथ पाकिस्तान में भी आम आदमी पार्टी का जीत का जश्न मना जिसकी ख़बरें नेशनल मिडिया में भी आई।ये यासीन का ही प्रभाव था की आम आदमी पार्टी के जीत के जश्न में केवल हरे गुब्बारों और हरे गुलाल का ही प्रयोग किया गया।(सत्यापन के लिए गूगल पर जीत की जश्न की तस्वीरें सर्च करें)

रेफरेंडम के पीछे क्या है केजरी की मंसा?

1. केजरी दिल्ली में संबिधान के विरुद्ध दिल्ली में रेफरेंडम कराकर कश्मीर और पूर्वोत्तर के अलगाववादियों की उन मांगों को बल देना चाहते हैं जिसमे अलगाववादी रेफरेंडम के बेस पर अलग देश की मांग कर रहे हैं।अभी तक भारत सरकारें ऐसी मांगो को असम्बैधानिक बताकर ख़ारिज करती रही हैं लेकिन एक बार दिल्ली में ऐसा हो जाने पर सरकार के लिए मुश्किल हो जायेगा।इस तरह यासीन मालिक को दिये गए वादे को केजरी निभाने में केजरी सफल हो जायेंगे।
2. केजरीवाल ने दिल्ली से बहुत बड़े बड़े वादे किये जिनका पूरा होना नामुमकिन है।दिल्ली का टोटल बजट 41 हज़ार करोड़ रुपये का है और वादों को पूरा करने के लिए प्रतिवर्ष ढाई लाख करोड़ रुपये की जरुरत है।इस तरह संबिधान विरुद्ध कदम उठाकर जनता को  ये बताना चाहते हैं की मैं करना तो बहुत कुछ चाहता हूँ लेकिन मोदी ऐसा करने नहीं दे रहे हैं।चुकी दिल्ली की 70 पर्सेंट से अधिक जनता ऐसी है जो पढ़ी लिखी तो है लेकिन इतना गहराई में जाकर नहीं सोच सकती इस तरह खुद को केंद्र सरकार के साजिशों का शिकार बताकर काम न कर पाने का एक्सयूज मिल जायेगा।
3. केजरीवाल इस समय पार्टी के भीतर मचे हुए घमासान से त्रस्त हैं।जैसा की पार्टी के चार सांसदों में से तीन ने पार्टी हाईकमान पर हिटलरशाही का आरोप लगाकर मोर्चा खोला हुआ है,पंजाब चुनाव से पहले केजरीवाल की उम्मीदों पर पानी फिरता दिख रहा है।ऐसी स्थिति में केजरी कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे जनता का ध्यान पार्टी में मचे घमासान से हट जाए।


Sunday, April 12, 2015

काटजू !तू हिन्दू की संतान नहीं हो सकता है

भारत भू की पावनता है,ममता की परिभाषा है।
धर्म सनातन की सुचिता है,जन जन की अभिलाषा है।
है प्रभात का पूजन,जन जन के मन का आराधन है।
जिसका रूप स्वरुप स्वयं में गोकुल है वृन्दावन है।
परिवारों का पोषण है हर घर की भाग्य विधाता है।
पशु मत समझो इसे गाय तो हर हिन्दू की माता है।
लेकिन देखो काश्मीर का पंडित कैसे डोल गया।
बामन का वंशज होकर के बाबर की भाषा बोल गया।
अरे काटजू शर्म न आई तुझको ये बतलाने में।
बड़ा मजा आया था तुझको मांस गाय का खाने में।
फिर से तू खायेगा ये भी बड़ी शान से बोला है।
कुल के दुष्ट कलंकी तुझपे खून हमारा ख़ौला है।
जो हिन्दू गर गौ माता की चीर फाड़ कर सकता है।
वो अपनी निज माता का भी बलात्कार कर सकता है।
जिसे गाय के टुकड़ों में प्रोटीन नज़र आ सकती है।
उसको अपनी बहने भी रंगीन नज़र आ सकती हैं।
भूख लगे गर ज्यादा माँ की कमर काट कर खा ले तू।
फिर भी ना यों पेट भरे तो सूअर काट कर खा ले तू।
गौ माता को खाया तू इंसान नहीं हो सकता है।
कुछ भी हो तू हिन्दू की संतान नहीं हो सकता है।
एकदिन तू रौंदा जायेगा प्रतिशोधी उन्मादों में।
तेरा नाम लिखा जायेगा गज़नी की औलादों में।
न्यायधीश है लेकिन तुझमे न्यायाधीश सी बात नहीं।
गौ माता के मूत्र बराबर भी तेरी औकात नहीं।

Monday, November 3, 2014

कुत्तों की दावत में बब्बर शेर नही जाया करते


एक संपोला फिर से बोला बोल बगावत वाले जी,
जिसकी आँखों में कांटे हैं मंदिर और शिवाले जी,

मस्जिद की मीनारों से जो ज़हर उगलता रहता है,
जिसकी रग में सदा प्रदूषित रक्त विदेशी बहता है,

जिसकी टोपी के धागों में मंसूबे जेहादी हैं, 
जिसकी दाढ़ी में लटके कुछ मजहब के उन्मादी हैं,

जिसकी आँखों में सुरमा हैं नफरत के अंगारों का,
जिसके मूहँ में पान दबा है पाकिस्तानी नारों का,

है इमाम लेकिन हराम की रोटी का व्यापारी है,
भारत माँ पर बोझ बना है, उसका नाम बुखारी है,

अपनी गद्दी अपने बेटे को बैठाने निकला है,
और सुना है बहुत बड़ा जलसा करवाने निकला है,

जलसे में दुश्मन धरती के हाकिम को बुलवाया है,
और हमारे मोदी जी को सरे आम बिसराया है,

सोच रहा है उसने खुलकर मोदी का उपहास किया,
लेकिन मूरख भूल गया है किंचित ना आभास किया,

मोदी मोदी है,सूरज को आँख दिखाने वाला है,
सरे आम इस्लाम की टोपी को ठुकराने वाला है,

तेरी क्या औकात बुखारी,मोदी को ठुकराने की,
नहीं ज़रुरत उसको है गद्दारों के नजराने की,

संविधान की मजबूरी है,दोनों हाथ मुरब्बा है,
लेकिन इतना याद रहे कि मोदी सबका अब्बा है,

अरे बुखारी जा तेरे बेटे का घर आबाद रहे,
खूब उडाना बकरे मुर्गे,लेकिन इतना याद रहे,

गौ मांस जो खांए,उनके संग नही खाया करते,
कुत्तों की दावत में बब्बर शेर नही जाया करते,

Sunday, February 9, 2014

आओ मिलो आज भारत बचाने को

मेरी नयी कविता सभी राष्टवादी देशभक्तों को समर्पित
___________________________
हिन्द को दंगों की खान बना डाला था।
हर गली,हर मकां,वीरान बना डाला था।
सत्ता के लिए देश को बाट देने वालों ने,
पूरे भारत को शमशान बना डाला था।

भगतों, सुभाषो के त्यागों को भूल कर,
गांधी और नेहरू महान बना डाला था
हमने पटेलों को सौपी थी सत्ता
पर दल्लों ने इसको नीलाम बना डाला था

आओ मिलो आज भारत बचाने को
अनगिन शहीदों के सपने सजाने को
भूखों को भोजन को,प्यासों को पानी को
मरते किसानो को,मरती जवानी को

आओ दिखादो तो अब,जनता की ताकत को
आओ हिला दो अब,खूनी विरासत को
भारत को अपनी जागीर समझ बैठे जो
भ्रष्टों को,चोरों को,पंजी हिमाकत को
______________________________
वन्देमातरम 

Sunday, October 20, 2013

सेक्युलर बनने के लिए कुछ शर्तें !

कमसे कम ५ शर्त मानिये और सेक्युलर हो जाइये !

- अलगाववादियों का समर्थन
-आतंकवादियों का समर्थन
-कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन
- गौहत्या का समर्थन
- जालीदार टोपी लगाना जरुरी
- अयोध्या में राम मंदिर का विरोध
-आतंकवादियों के परिवार को सहयोग
-शहीदों का अपमान
-हज पर सब्सिडी और अमरनाथ यात्रा पर टैक्स का समर्थन
- आतंकवादियों के परिवार को आर्थिक सहायता का समर्थन
-आतंकवादियों को जेल से छोड़ने का समर्थन
-कम्युनिस्टों और नक्सालियों का समर्थन
-वन्देमातरम का विरोध
-तिरंगे का अपमान करने वालों का समर्थन
-पाकिस्तानी आतंकवादियों को बिरयानी खिलने का समर्थन
आतंकवादियों को अपने घर,राज्य या मोहल्ले की बहु,बेटी,बीटा या ताऊ घोषित करना
-हिन्दू संतों का अपमान

अगर आप ऐसा नहीं कर पाते तो मेरी तरह साम्प्रदायिक बने रहिये और "वन्देमातरम"गाते रहिये.

Friday, October 18, 2013

कुछ ज्ञानवर्धक ट्रिक

अच्छे बुरे की पहचान कैसे करें?


-जिसके खिलाफ दिग्विजय सिंह बोल रहे होंगे वह अच्छा ही होगा


इस समय भारतवर्ष की सबसे बड़ी गाली 



-अबे तू खान्ग्रेसी है क्या?


देश द्रोही को कैसे पहचाने ?



-या तो मुलायम सिंह का करीबी होगा या उसके थोड़े से कष्ट पर भी 



सोनिया गांधी फूट-फूट कर रो रही होंगी.


कैसे पहचाने की भासण देने वाला व्यक्ति राहुल गाँधी ही है?



-भासण का अंश "मेरे माँ की $$$ मेरे माँ ने $$$ मम्मी $$$


दूर से कैसे पहचाने की रैली किस पार्टी की है.



-भाजपा :भारत माता की जय,वन्देमातरम,जय हिन्द 


....
-कांग्रेस : सोनिया जी जिंदाबाद,राहुल गाँधी जिंदाबाद 

Saturday, September 7, 2013

यूपी के सपा सरकार का एक शर्मनिरपेक्ष चेहरा और मुजफ्फरनगर में हो रहे दंगे एवं हिन्दू नरसंघार का सच

मुजफ्फर नगर में हो रहे दंगे की पठकथा उसी दिन लिख दी गयी थी जब एक हिन्दू लड़की के साथ हुए छेड़छाड की घटना के बाद विरोध कर रही भीड़ पर प्रशाशन एकतरफा हिन्दुओं पर करवाई करने में जुटा रहा. लड़की के दोनों भाइयों गौरव और सचिन की हत्या कर दी गयी और प्रशाशन फिर भी चुप रहा और हिन्दुओं को पकड़-पकड़ कर जेल में ठुसता रहा.अखिलेश यादव को अपने मुस्लिम वोट बैंक की चिंता थी और वो जानते थे की हिन्दू तो चूति....हैं वो तो जाति के नाम पर हमें वोट देंगे ही,अतः दोषी मुसलमानों पर कोई करवाई नहीं हुई और छेड़छाड़  करने वाले आराम से घूमते रहे.उल्टा अखिलेश सर्कार ने मुज़फ्फर नगर के एसपी सुरेन्द्र सिंह को हटाकर अब्दुल हमीद को बना दिया गया जिससे हिन्दुओं पर एकतरफा करवाई से मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके.इसकी परिणिति कल की घटना के रूप में हुई जब मुसलमानों द्वारा मस्जिदों से घात लगाकर किये गए हमलों में दर्ज़नो हिन्दू मारे गए,सैकणों घायल हुए और कई अब अभी लापता हैं.
मै यहाँ केवल मुसलमानों को दोष नहीं दे सकता और न ही अखिलेश सरकार को.क्योंकि हिन्दू जातिओं मे बटे रहे और अपनी जाति को वोट देते रहे मुसलमान एक जुट होकर उनकी सुनने वालों को वोट देते है. इसी लिये मुलायम, नीतीश, लालू जैसे नेता पैदा होते हैं और फलते फूलते है जिम्मेदारी हिन्दू जनता की है जो सोंच समझ कर वोट नही करती वो दिन दूर नही जब हिन्दुस्तान मे न हिन्दू बचेगा न कोई हिन्दू जाती हिन्दू खुद आत्मघाती है कोई उसकी क्या मदद करेगा?

Thursday, August 15, 2013

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कुछ गुमनाम चेहरे जिन्होंने देश के लिए सबकुछ अर्पण कर दिया


भगवती चरण वोहरा [ जुलाई 1903 - 28 मई 1930] क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। पिता की मौत के बाद वह खुलकर इस लड़ाई में शामिल हो गए। बेहद तंगी के दिनों में भी उन्होंने अपने ससुराल पक्ष से मिले पैसों को आजादी की लड़ाई में खर्च कर दिया। मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। भगत सिंह व भगवती चरण वोहरा सहित सदस्यों ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। वोहरा लखनऊ के काकोरी केस, लाहौर षड़यंत्र केस, लाला लाजपत राय को मारने वाले अंग्रेज साजर्ेंट - सांडर्स की हत्या में भी आरोपित थे। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय वोहरा जी शहीद हो गए थे।

सुशीला दीदी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की बेहदसक्रिय सदस्य थीं। लाला लाजपत राय के हत्यारे सॉन्डर्स को मौत के घाट उतारने के बाद उन्होंने ही कलकत्ता में भगत सिंह के ठहरने की व्यवस्था की थी। 1 अक्टूबर 1933 को उन्होंने यूरोपीय सार्जेट टेलर को खत्म करने में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही। इसके बाद वह अंग्रेजों की आंखों में धूल झौंकने में कामयाब रहीं। आजादी के बाद वह दिल्ली में ही बस गई।

 दुर्गा भाभी [7 अक्टूबर 1902- 14 अक्टूबर 1999] भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों की प्रमुख सहयोगी थीं। 18 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह ने इन्ही दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से ़यात्रा की थी। बेहद निडर और साहसी दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। उस समय भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं। 14 अक्टूबर 1999 को 97 वर्ष की आयु में उनका निधन उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में हो गया।

अशफाक उल्ला खान (1900-1927) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्होंने काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर अभियोग चलाया और 19 दिसम्बर सन् 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फाँसी पर लटका दिया गया। अशफाक उर्दू भाषा के बेहतरीन शायर थे।

उधम सिंह का [26 दिसंबर 1899- 31 जुलाई 1940]1919 में आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। वह 13 अप्रैल, 1919 को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। वह इसके दोषी जनरल डायर को इसका सबक सिखाना चाहते थे। इसके चलते उन्हें काफी लंबा इंतजार करना पड़ा। सन 1934 में वह डायर का पीछा करते हुए लंदन पहुंचे। 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में एक बैठक के माइकल ओ डायर भी मौजूद था। उधम सिंह ने उसको वहीं दो गोलियां मारकर ढेर कर दिया। उन्हें गिरफ्तार कर उनके ऊपर केस चलाया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।

काला सिंह [12 फरवरी 1882- 12 अगस्त, 1915] जगतपुरा निवासी सुरमुख सिंह के घर 12 फरवरी, 1882 को पैदा हुए थे। अंग्रेजी हकूमत की गुलामी बर्दाश्त न होने पर काला सिंह ने फौज की नौकरी छोड़ दी और गदर पार्टी में शामिल हो गए। उन्होंने कई अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट उतारने के साथ-साथ उनके कई मुखबिरों को भी मार दिया। इस पर अंग्रेज हकूमत ने उसे पकड़ लिया और 12 अगस्त, 1915 को आतंकी करार देकर फांसी के फंदे पर लटका दिया।


Saturday, July 27, 2013

गोधरा और गुजरात : सच्चाई की अनभिज्ञता है विवादों की वज़ह


गुजरात दंगे का सच आज जहा देखो वहा गुजरात के दंगो के बारे में ही सुनने और देखने को मिलता है फिर चाहे वो गूगल हो या फेसबुक हो या फिर टीवी चैनेल | रोज रोज नए खुलाशे हो रहे हैं | रोज गुजरात की सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाता है| सबका निशाना केवल एक नरेन्द्र मोदी | जिसे देखो वो अपने को को जज दिखाता है| हर कोई सेकुलर के नाम पर एक ही स्वर में गुजरात दंगो की भर्त्सना करते हैं |
कारसेवको को मारने के लिए ट्रेन को जलाने की कई दिनों से योजना बन रही थी-
साबरमती ट्रेन हादसे में मौत की सजा प्राप्त अब्दुल रजाक कुरकुर के अमन गेस्टहाउस पर ही कारसेवको को जिन्दा जलाने की कई हप्तो से योजना बनी थी ... इसके गेस्टहाउस से कई पीपे पेट्रोल बरामद हुए थे |
पेट्रोल पम्प के कर्मचारीयो ने भी कई मुसलमानों को महीने से पीपे में पेट्रोल खरीदने की बात कही थी और उन्हें पहचान परेड में पहचाना भी था .. पेट्रोल को सिगनल फालिया के पास और अमन गेस्टहाउस में जमा किया जाता था |
गोधरा से तत्कालीन सहायक स्टेशन मास्टर के द्वारा वडोदरा मंडल ट्रेफिक कंट्रोलर को भेजी गयी गुप्त रिपोर्ट ::-
गोधरा के तत्कालीन सहायक स्टेशन मास्टर राजेन्द्र मीणा ने वडोदरा मंडल के ट्रेफिक कंट्रोलर को आरपीएफ के गुप्तचर शाखा के जानकारी के आधार पर एक रिपोर्ट भेजी थी जिसमे उन्होंने कहा था की गोधरा आउटर पर किसी भी सवारी ट्रेन को रोकना और खासकर अयोध्या जाने वाली या आने वाली साबरमती एक्सप्रेस को रोकना बहुत खतरनाक होगा क्योकि कुछ संदिग्ध लोग कारसेवको को नुकसान पहुचाने की योजना बना रहे है उन्होंने लिखा था की ट्राफिक को इस तरह से कंट्रोल किया जाए की साबरमती ट्रेन को आउटर पर रुकना न पड़े

गौरतलब है की जिस जगह यानी सिगनल फलिया पर साबरमती ट्रेन को जलाया गया था ठीक उसी जगह पर 28 November 1990 को पांच हिन्दू टीचरों को जलाकर मारा गया था जिसमे दो महिला टीचर थी ..इस केस में भी बीस मुसलमानों को आरोपी पाया गया था

आखिर ट्रेन हादसे के दो दिनों के बाद गुजरात में दंगे क्यों भडके ?
मित्रो कभी आपने सोचा है कि जब ट्रेन 27 फरवरी को जलाई गयी तो गुजरात में पहली हिंसा दो दिन के बाद यानी 29 फरवरी को क्यों हुई ?

मित्रो साबरमती हादसे की किसी भी मुस्लिम सन्गठन ने निंदा नही की .. उलटे जमायत ये इस्लामी हिन्द के तत्कालीन प्रमुख ने इसके लिए कारसेवको को ही जिम्मेदार ठहरा दिया .. शबाना आजमी ने भी कहा की कारसेवको को उनके किये की सजा मिली है ..आखिर क्या जरूरत थी अयोध्या जाने की ...तीस्ता जावेद सेतलवाड और मल्लिका साराभाई और शबनम हाश्मी ने एक संयुक्त प्रेस कांफेरेस के कहा की हमे ये नही भूलना चाहिए की वो कार सेवक किसी नेक मकसद के नही गये थे बल्कि विवादित जगह पर मन्दिर बनाने गये थे |
मशहूर पत्रकार वीर संघवी ने भी इंडियनएक्सप्रेस में एक आर्टिकल लिखा था ""they condemn the crime, but blame the victims" उन्होंने लिखा था की ऐसे बयानों ने हिन्दुओ को झकझोर दिया था |
जब भी मीडिया गुजरात दंगो की बात करता है तब वो दंगे भडकने के पहले और गोधरा ट्रेन हादसे के बाद 27 February 2002 को गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और बड़े कांग्रेसी नेता अमरसिंह चौधरी का टीवी पर आकर दिया गया बयान क्यों नही दिखाता ?
मित्रो, अमरसिंह चौधरी ने साबरमती ट्रेन हादसे की निंदा नही की बल्कि उलटे वो कारसेवको को कोसने लगे और मृत कारसेवको के बारे में अनाप सनाप बकने लगे .. और कहा की ये लोग खुद अपनी मौत के जिम्मेदार है ..इन सब बातो ने गुजरात की जनता को भडकाने का काम लिया ..
अब सवाल उठता है की गुजरात दंगा हुआ क्यों ? 27 फरवरी 2002 साबरमती ट्रेन के बोगियों को जलाया गया गोधरा रेलवे स्टेशन से करीब ८२६ मीटर की दुरी पर स्थित जगह सिगनल फालिया पर | इस ट्रेन में जलने से 58 लोगो को मौत हुई | 25 औरते और 19 बच्चे भी मारे गये |
प्रथम दृष्टया रहे वहा के 14 पुलिस के जवान जो उस समय स्टेशन पर मौजूद थे और उनमे से ३ पुलिस वाले घटना स्थल पर पहुचे और साथ ही पहुचे अग्नि शमन दल के एक जवान सुरेशगिरी गोसाई जी | अगर हम इन चारो लोगो की माने तो म्युनिसिपल काउंसिलर हाजी बिलाल भीड़ को आदेश दे रहे थे ट्रेन के इंजन को जलने का| साथ ही साथ जब ये जवान आग बुझाने की कोशिस कर रहे थे तब ट्रेन पर पत्थरबाजी चालू कर दी गई भीड़ के द्वारा| अब इसके आगे बढ़ कर देखे तो जब गोधरा पुलिस स्टेशन की टीम पहुची तब २ लोग १०,००० की भीड़ को उकसा रहे थे ये थे म्युनिसिपल प्रेसिडेंट मोहम्मद कलोटा और म्युनिसिपल काउंसिलर हाजी बिलाल|
अब सवाल उठता है की मोहम्मद कलोटा और हाजी बिलाल को किसने उकसाया और ये ट्रेन को जलाने क्यों गए?
असल में गोधरा की मुख्य मस्जिद का मौलाना मौलवी हाजी उमर जी ही इस कांड का मुख्य आरोपी पाया गया और उसे अदालत ने फांसी की सजा दी ..जिसे बाद में आजीवन कारावास में तब्दील किया गया | दुसरे आरोपीयो ने विभिन्न जाँच एजेंसियों और कोर्ट में बताया की मौलाना उमरजी कई हप्तो से मस्जिद में नमाज के बाद भडकाऊ तकरीर देता था और कहता था की हमे बदला लेना है ..इन कारसेवको ने बाबरी मस्जिद तोड़ी है इसलिए हर मुसलमान का फर्ज है की वो बदला ले |सवालो के बाढ़ यही नहीं रुकते हैं बल्कि सवालो की लिस्ट अभी लम्बी है|अब सवाल उठता है की क्यों मारा गया ऐसे राम भक्तो को| कुछ मीडिया ने बताया की ये मुसलमानों को उकसाने वाले नारे लगा रहे....अब क्या कोई बताएगा की क्या भगवान राम के भजन मुसलमानों को उकसाने वाले लगते हैं?लेकिन इसके पहले भी एक हादसा हुआ २७ फ़रवरी २००२ को सुबह ७:४३ मिनट ४ घंटे की देरी से जैसे ही साबरमती ट्रेन चली और प्लेटफ़ॉर्म छोड़ा तो प्लेटफ़ॉर्म से १०० मीटर की दुरी पर ही १००० लोगो की भीड़ ने ट्रेन पर पत्थर चलाने चालू कर दिए पर यहाँ रेलवे की पुलिस ने भीड़ को तितर बितर कर दिया और ट्रेन को आगे के लिए रवाना कर दिया| पर जैसे ही ट्रेन मुस्किल से ८०० मीटर चली अलग अलग बोगियों से कई बार चेन खिंची गई |बाकि की कहानी जिसपर बीती उसकी जुबानी | उस समय मुस्किल से १५-१६ साल की बच्ची की जुबानी |ये बच्ची थी कक्षा ११ में पढने वाली गायत्री पंचाल जो की उस समय अपने परिवार के साथ अयोध्या से लौट रही थी की माने तो ट्रेन में राम धुन चल रहा था और ट्रेन जैसे ही गोधरा से आगे बढ़ी एक दम से रोक दिया गई चेन खिंच कर | उसके बाद देखने में आया की एक भीड़ हथियारों से लैस हो कर ट्रेन की तरफ बढ़ रही है | हथियार भी कैसे लाठी डंडा नहीं बल्कि तलवार, गुप्ती, भाले, पेट्रोल बम्ब, एसिड बल्ब्स और पता नहीं क्या क्या | भीड़ को देख कर ट्रेन में सवार यात्रियों ने खिड़की और दरवाजे बंद कर लिए पर भीड़ में से जो अन्दर घुस आए थे वो कार सेवको को मार रहे थे और उनके सामानों को लूट रहे थे और साथ ही बहार खड़ी भीड़ मरो-काटो के नारे लगा रही थी | एक लाउड स्पीकर जो की पास के मस्जिद पर था उससे बार बार ये आदेश दिया जा रहा था की "मारो, काटो. लादेन ना दुश्मनों ने मारो" | साथ ही बहार खड़ी भीड़ ने पेट्रोल डाल कर आग लगाना चालू कर दिया जिससे कोई जिन्दा ना बचे| ट्रेन की बोगी में चारो तरफ पेट्रोल भरा हुआ था| दरवाजे बहार से बंद कर दिए गए थे ताकि कोई बहार ना निकल सके| एस-६ और एस-७ के वैक्यूम पाइप कट दिया गया था ताकि ट्रेन आगे बढ़ ही नहीं सके| जो लोग जलती ट्रेन से बहार निकल पाए कैसे भी उन्हें काट दिया गया तेज हथियारों से कुछ वही गहरे घाव की वजह से मारे गए और कुछ बुरी तरह घायल हो गए|
गोधरा फायर सर्विस के जवानो का बयान
नानावती औरशाह आयोग को दिए अपने बयानों में फायर बिग्रेड के लोगो ने कहा की जबहमे सुचनामिली की ट्रेन जलाई गयी है तो हम तुरंत पहुचे लेकिन सिग्लन फालिया के पास कई मुस्लिम महिलाये और बच्चे हमारा सामने लेट गये ..और कई लोग चिल्ला रहे थे की इनको तब तक मत जाने देना जबतक की ट्रेन पूरी तरह जल न जाये |
हिन्दू सड़क पर उतारे 29 फ़रवरी 2002 के दोपहर से | पूरा दो दिन हिन्दू शांति से घरो में बैठा रहा| अगर वो दंगा हिंदुवो या मोदी को करना था तो 27 फ़रवरी 2002 की सुबह 8 बजे से क्यों नहीं चालू हुआ? जबकि मोदी ने 28 फ़रवरी 2002 की शाम को ही आर्मी को सडको पर लाने का आदेश दिया जो की अगले ही दिन १ मार्च २००२ को हो गया और सडको पर आर्मी उतर आयी गुजरात को जलने से बचाने के लिए | पर भीड़ के आगे आर्मी भी कम पड़ रही थी तो १ मार्च २००२ को ही मोदी ने अपने पडोसी राज्यों से सुरक्षा कर्मियों की मांग करी| ये पडोसी राज्य थे महाराष्ट्र (कांग्रेस शासित- विलाश राव देशमुख मुख्य मंत्री), मध्य प्रदेश (कांग्रेस शासित- दिग विजय सिंह मुख्य मंत्री), राजस्थान (कांग्रेस शासित- अशोक गहलोत मुख्य मंत्री) और पंजाब (कांग्रेस शासित- अमरिंदर सिंह मुख्य मंत्री) | क्या कभी किसी ने भी इन माननीय मुख्यमंत्रियों से एक बार भी पुछा की अपने सुरक्षा कर्मी क्यों नहीं भेजे गुजरात में जबकि गुजरात ने आपसे सहायता मांगी थी | या ये एक सोची समझी गूढ़ राजनीती द्वेष का परिचायक था इन प्रदेशो के मुख्यमंत्रियों का गुजरात को सुरक्षा कर्मियों का ना भेजना|
साबरमती ट्रेन हादसा और लालूप्रसाद यादव की घटिया राजनीती जो बाद में गलत साबित हुई
साबरमती ट्रेन हादसे के ढाई साल के बाद जब घटिया और नीच सोच रखने वाले लालूप्रसाद यादव रेलमंत्री बने तो उन्होंने इस हादसे पर अपनी नीच और गिरी हुई राजनितिक रोटी सेकने के लिए रेलवे के द्वारा बनर्जी आयोग बनाया .. और इस आयोग को पहले ही बता दिया गया था की आपको क्या रिपोर्ट देनी है | असल में कुछ महीनों के बाद बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले थे और लालूप्रसाद यादव चाहते थे की किसी भी हिंदूवादी दल को इसका फायदा न मिले बल्कि हिंदूवादी संघटनों को और कारसेवको को ही दोषी ठहरा दिया जाये |
सोचिये जो बोगी ढाई सालो तक खुले आसमान के पड़ी रही उस बोगी की जाँच करके बनर्जी आयोग ने कहा की ट्रेन अंदर से जलाई गयी थी .. मतलब वो कहना चाह रहे थे की सभी कारसेवको को सामूहिक आत्मदाह करने की इच्छा हो गयी इसलिए उन्होंने खुद ही ट्रेन में आग लगा ली और किसी ने भी बाहर निकलने की कोशिस नही की | मजे की बात देखिये की जस्टिस बनर्जी ने जनवरी २००५ को यानी बिहार चुनाव घोषित होने के ठीक दो दिन पहले अपना विवादास्पद रिपोर्ट सार्वजनिक किये ताकि इस रिपोर्ट के आधार पर लालूप्रसाद यादव बिहार के मुसलमानों को भड़काकर उनका वोट हासिल कर सके |
लेकिन गोधरा ट्रेन हादसे में जख्मी हुए नीलकंठ तुलसीदास भाटिया नामक एक शक्स ने बनर्जी आयोग के झूठे रिपोर्ट को गुजरात हाईकोर्ट में चेलेंज किया | गुजरात हाईकोर्ट ने विश्व के जानेमाने फायर विशेषज्ञ और फोरेंसिक एक्पर्ट का एक पैनेल बनाया . और जस्टिस उमेश चन्द्र बनर्जी को इस पैनेल के सामने पेश होने का सम्मन दिया ... तीन सम्मनो के बाद पेश हुए बनर्जी साहब ने ये नही बता पाया की आखिर उन्होंने ये कैसे निष्कर्ष निकला की ट्रेन में आग भीतर से लगी है .. जबकि आग के पैटर्न और सभी गवाहों और खुद अभियुक्तों के बयानों पे अनुसार आग बाहर से लगाई गयी थी और दरवाजो को बाहर से बंद कर दिया गया था ..जस्टिस बनर्जी कोई जबाब नही दिए और कोर्ट में कहा की वो एक आयोग के मुखिया होने के नाते किसी भी सवाल का जबाब देने के लिए बाध्य नही है .. मेरा काम था रेलवे को रिपोर्ट देना इसे सही या गलत मानना तो रेलवे का काम है |
यानी ये पूरी तरह साबित हो गया था की लालूप्रसाद यादव में जस्टिस उमेशचन्द्र बनर्जी आयोग का गठन सिर्फ अपने राजनीतक रोटिया सेकने के लिए ही किया था | इस आयोग को लालू ने पहले ही बता दिया था की मुझे किस तरह की जाँच रिपोर्ट चाहिए |
फिर ओक्टूबर २००६ के गुजरात हाईकोर्ट की चार जजों की बेंच ने जिसमे सभी जज एक राय पर सहमत थे उन्होंने लालू के बनर्जी आयोग की रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया और टिप्पड़ी करते हुए कहा की कोई रिटायर जज किसी नेता के हाथ की कटपुतली न बने ..गुजरात हाईकोर्ट ने बनर्जी रिपोर्ट को रद्दी, बकवास कहा .. अपनी टिप्पड़ी में गुजरात हाईकोर्ट ने कहा
"Gujarat High Court quashed the conclusions of the Banerjee Committee and ruled that the panel was "unconstitutional, illegal and null and void", and declared its formation as a "colourable exercise of power with mala fide intentions", and its argument of accidental fire "opposed to the prima facie accepted facts on record."


लेकिन ताज्ज्जुब हैकी मीडिया और दोगले सेकुलर लोग सिर्फ एक तरफी बाते ही चलाते है

Tuesday, July 9, 2013

हे राम दुबारा मत आना !!

हे राम दुबारा मत आना, अब यहाँ लखन हनुमान नही.
90 करोड़ इन मुर्दों मे, अब बची किसी में जान नही .
भाई भाई का दुश्मन है,बहनो का भी सम्मान नही .
हम कैसे कह दें कि हिंदू अब, तुर्कों की संतान नही .
इतिहास स्वयं का भूल गए ,भगवापर भी अभिमान नही.
अब याद इन्हे बस अकबर है, राणा प्रताप बलवान नही .
हल्दी घाटी सूनी सी है ,चेतक का भी तूफान नही .
हिंदू भी होने लगे दफ़न ,अब जलने को शमशान नही .
भारत की चीखें गूँज रही ,निज देश का भी सम्मान नही .
साई ही इनके सब कुछ हैं , अब महादेव भगवान नही.


Friday, June 28, 2013

ब्यंग : हमारे केजरीवाल जी तो जन्मजात धर्मनिरपेक्ष हैं !

मित्रोँ , आप सबको तो पता ही है कि हमारे केजरीवाल जी कोई मामूली इंसान नहीँ हैँ, वे धरती पर नेकी और धर्मनिरपेक्षता फैलाने के लिए साक्षात् खुदा द्वारा भेजे गए फरिश्ते हैँ . 
लेकिन धरती पर आने के बाद से उन्होँने अपने आपको बिल्कुल एक "आम-आदमी" की तरह पेश किया है , परंतु किसी भी हालत मेँ धर्मनिरपेक्षता से सौदा नहीँ किया.
आज आपको उनके बचपन का एक वाकया सुनाता हूँ , ये बात उन दिनोँ की है जब केजरीवाल जी एक नन्हेँ से प्रखर बुद्धि बालक थे और "दारुल-अल-इस्लामिया" नामक एक मदरसे मेँ तालीम ले रहे थे.
हुआ यूँ कि जब उनके पाँचवेँ दर्जे के सालाना पर्चे चल रहे थे तो भूगोल के पर्चे मेँ एक बड़ा ही अजीब सा सवाल था , "पृथ्वी की परिधि की लंबाई बताइए?" 
यह सवाल देखकर युगपुरुष जी की आँखेँ फटी की फटी रह गईँ, उन्हेँ किसी साजिश की बू आने लगी, वे सोच मेँ पड़ गए कि मदरसा कमिटी के चेयरमैन मौलाना मरदूद उल्लाह मदनी ने तो ये बताया था कि धर्मनिरपेक्ष ग्रन्थोँ के मुताबिक पृथ्वी चपटी है , तो फिर चपटी चीज की परिधि कैसे हो सकती है और ये भी बताया था उस ग्रन्थ मेँ लिखी प्रत्येक बात सार्वभौमिक सत्य है। -
फिर क्या था मित्रोँ , आदरणीय केजरीवाल जी ने वो नापाक सवाल ही छोड़ दिया , और सिर्फ इसी वजह से भूगोल के पर्चे मेँ उनके 100 मेँ से 99 अंक ही आए ,
मित्रोँ वो चाहते तो अन्य छात्रोँ के माफिक गलत उत्तर लिखकर 1 अतिरिक्त अंक प्राप्त कर सकते थे , लेकिन ये उनकी फितरत ही नहीँ कि महज एक अंक के लिए धर्मनिरपेक्षता से समझौता कर लेँ . -
हालांकि एक महीने बाद ही उन्होँने ये खुलासा कर दिया कि पेपर सेट करनेवाला आदमी संघी था और मदरसे जैसी पाक और धर्मनिरपेक्ष जगह को सांप्रदायिक बनाना चाहता था।
देखा मित्रोँ , हमारे केजरीवाल जी आज से नहीँ जन्म जन्मांतर से इन संघियोँ के निशाने पर रहे हैँ , लेकिन आजतक हार नहीँ मानी , आज भी वो नित-नए उत्साह के साथ सांप्रदायिकता के खिलाफ झंडा गाड़े हुए हैँ।
जय हो केजरीवाल जी की।

Saturday, June 15, 2013

मेरी डायरी से

कुछ दिन पहले मेरे आफिस में मेरे मित्र संजय जी, अशोक जी, नदीम भाई और अफरोज भाई बैठे थे । बात चल रही थी राजनीति की । नदीम भाई ने मुझसे सवाल किया कि इस देश की जनता के बारे में आप की क्या राय है ??मैंने दो पल सोंचने के बाद मुस्कुराते हुए कहा "इस देश की जनता इस देश के मुसलमान की तरह बेवकूफ है" । मेरा ये कहना था की नदीम भाई और अफरोज भाई मुझपर बिदक गएऔर आपत्ति करने लगे क्यूंकि मैंने एक तीर से दो शिकार कर दिए थे । जनता के साथ-साथ मुसलमानों को भी बेवकूफ कह दिया था । पर मैंने अपने शब्द वापस नहीं लिए औरदृढ़तापूर्वक अपनी बात पर डटा रहा । आखिर अफरोज भाई ने मुझसे पूछ ही लिया कि मैंने आखिर ऐसा क्यूँ कहा ।मैंने अफरोज भाई से पूछा कि : बाबर और औरंगजेब के बारे में आप की क्या राय है ?अफरोज: वो असली मर्द थे, उन्होंने इस्लाम को भारत में फैलाया । औरंगजेब निहायत ही ईमानदार शख्स था । और उन्होंने भारत में कई मस्जिद बनवाई ।मैं: पर बाबर और औरंगजेब ने मन्दिरों को तोड़ कर मस्जिदें बनवाई थी ।अफरोज: सिर्फ अल्लाह होता है और उसके सिवा कुछ नहीं होता । मूर्ती पूजा काफिर करते हैं । काफिरों को सही रास्ते पर लाने के लिए मस्जिदें बनवाई गई ।बाबर और औरंगजेब काबिल-ए -तारीफ थे ।मैं: पर उन्होंने ने गरीब जनता पर बहुत ज़ुल्म किये । कई हिन्दुओं को जबरन इस्लाम क़ुबूल करवाया । जिन्होंने ने विरोध किया, उनको क़त्ल कर दिया गया और उनकी माँ-बहन-बेटियों के साथ बलात्कार किये गए ।अफरोज: (गर्व के साथ) ये इस्लाम की शक्ति है । इस्लाम से ज्यादा ताकतवर खुछ भी नहीं । महान औरंगजेब ने हिन्दुओं को उनकी औकात बता दी थी ।मैं: पर ये तो अत्याचार था ।अफरोज: (घमंड और थोड़े गुस्से से) वो सब काफिर थे , वो इसी लायक थे ।मैं: नहीं भाई ... वो काफिर नहीं थे । वो सब जो मार दिए गए थे , वो आप के ही दादा-परदादा थे और जिनके साथ बलात्कार हुआ, वो आपकी दादी-परदादी थी । उन्ही से जो संताने पैदा हुई, वो आज के मुसलमान हैं । मुझे ताजुब्ब हैकी आपको अपने घर की माँ-बहनों के साथ बलात्कार करने वाले असली मर्द नज़र आते हैं । कैसे इंसान हैं आप ??अफरोज: आप मनगढ़ंत और फ़ालतू की बात कर रहे हो ।मैं: अच्छा, अगर ऐसा नहीं है तो तो क्या आप असली तुर्क है ? क्या आप ये कहना चाहते हैं की आप के परदादा तुर्क थे और वो घोड़े पर बैठ कर बाबर के साथ भारत आये थे ?अफरोज: अमां, ऐसा नहीं है ।मैं: अरे भाई, तो क्या आप आसमान से आये हो । कम से कम आप ही बताओ कि आप के खानदान की उत्पत्ति कैसे हुई ??अफरोज : (आश्चर्यचकित एवं खामोश)!!!मैं: जिस प्रकार आपको आपकी माँ-बहन के साथ बलात्कार करने वाला अलसी मर्द नज़र आता है, और आप उसको protect कर रहे हैं, उसी प्रकार इस देश की जनता को वो नेता पसंद आता है जो उसका शोषण और बलात्कार करता है । जनता का हित करने वाला नेता तो जनता को चूतिया नज़र आता है । दरअसल,मूर्ख जनता अपना भला करने वाले नेता के बारे में ये सोंचती है की "ज़रूर इनका कोई फायदा होगा" । इसीलिए मैंने कहा की इस देश की जनता इस देश के मुसलमान की तरह बेवकूफ है ।अफरोज : (आश्चर्यचकित और दो पल मौन रहने के बाद) चलें भाई, आज बहुत काम है.(कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी आज के बाबर औरऔरंगजेब हैं । क्या अब समझ में आया की अल्पसंख्यक इनको क्यूं पसंद करते हैं ?)

Friday, June 14, 2013

हैदराबाद का भारत में विलय और एम्आईएम्, नेहरु व सरदार पटेल :इतिहास के कुछ अनजान पहलू

क्या आप को सरदार पटेल , हैदराबाद निजाम औरएम्आईएम् का किस्सा पता है ?
जिसकी खबर सुन के नेहरु ने फ़ोन तोड़ दिया था | तथ्य जो कभी बताये नहीं गए -

1- हैदराबाद विलय के वक्त नेहरु भारत में नहीं थे |
2- हैदराबाद के निजाम और नेहरु ने समझौता किया था अगर उस समझौते पे ही रहा जाता तो आज देश के बीच में एक दूसरा पकिस्तान होता |
3 - मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एम्आईएम्) के पास उस वक़्त २००००० रजाकार थे जो निजाम के लिए काम करते थे और हैदराबाद का विलय पकिस्तान में करवाना चाहते थे या स्वतंत्र रहना |

बात तब की है जब १९४७ में भारत आजाद हो गया उसके बाद हैदराबाद की जनता भी भारत में विलय चाहती थी | पर उनके आन्दोलन को निजाम ने अपनी निजी सेना रजाकार के द्वारा दबाना शुरू कर दिया |

रजाकार एक निजी सेना (मिलिशिया) थी जो निजाम ओसमान अली खान के शासन को बनाए रखने तथा हैदराबाद को नव स्वतंत्र भारत में विलय का विरोध करने के लिए बनाई थी। यह सेना कासिम रिजवी द्वारा निर्मित की गई थी। रजाकारों ने यह भी कोशिश की कि निजाम अपनी रियासत को भारत के बजाय पाकिस्तान में मिला दे।

रजाकारों का सम्बन्ध 'मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एम्आईएम्) नामक राजनितिक दल से था।
नोट -ओवैसी भाई इसी MIM की विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं और कांग्रेस की मुस्लिम परस्ती और देश विरोधी नीतियों की वजह से और पकिस्तान परस्त मुल्लो की वजह से ये आज तक हिन्दुस्तान में काम कर रही है |

चारो ओर भारतीय क्षेत्र से घिरे हैदराबाद राज्य की जनसंख्या लगभग 1करोड60लाख थी जिसमें से 85%हिंदु आबादी थी।
29नवंबर1947 को निजाम-नेहरू में एक वर्षीय समझौता हुआ कि हैदराबाद की यथा स्थिति वैसी ही रहेगी जैसी आजादी के पहले थी।
नोट - यहाँ आप देखते हैं की नेहरु कितने मुस्लिम परस्त थे की वो देश द्रोही से समझौता कर लेते हैं |
पर निजाम नें समझौते का उलंघन करते हुए राज्य में एक रजाकारी आतंकवादी संगठन को जुल्म और दमन के आदेश दे दिए और पाकिस्तान को 2 करोड़ रूपये का कर्ज भी दे दिया.

राज्य में हिंदु औरतों पर बलात्कार होने लगे उनकी आंखें नोच कर निकाली जाने लगी और नक्सली तैय्यार किए जाने लगे.

सरदार पटेल निजाम के साथ लंबी लंबी झुठी चर्चाओं से उकता चुके थे अतः उन्होने नेहरू के सामने सीधा विकल्प रखे कि युद्ध के अलावा दुरा कोई चारा नही है। पर नेहरु इस पे चुप रहे |

कुछ समय बीता और नेहरु देश से बाहर गए सरदार पटेल गृह मंत्री तथा उप प्रधान मंत्री भी थे इसलिए उस उस वक़्त सरदार पटेल सेना के जनरलों को तैयार रहने का आदेश देते हुए विलय के कागजों के साथ हैदराबाद के निजाम के पास पहुचे और विलय पे हस्ताक्षर करने को कहा |

निजाम ने मना किया और नेहरु से हुए समझौते का जिक्र किया उन्होंने कहा की नेहरु देश में नहीं है तो वो ही प्रधान हैं |

उसी वक्त नेहरु भी वापस आ रहे थे अगर वो वापस भारत की जमीन पे पहोच जाते तो विलय न हो पाता इस को ध्यान में रखते हुए पटेल ने नेहरु के विमान को उतरने न देने का हुक्म दिया तब तक भारतीय वायु सेना के विमान निजाम के महल पे मंडरा रहे थे | बस आदेश की देरी को देखते हुए निजाम ने उसी वक़्त विलय पे हस्ताक्षर कर दिए | और रातो रात हैदराबाद का भारत में विलय हो गया |

उसके बाद नेहरु के विमान को उतरने दिया गया लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने नेहरु को फ़ोन किया और बस इतना ही कहा " हैदराबाद का भारत में विलय " ये सूनते ही नेहरु ने वो फ़ोन वही एअरपोर्ट पे पटक दिया "

उसके बाद रजाकारो (एम्आईएम्) ने सशस्त्र संघर्ष शुरू कर दिया जो 13 सितम्बर 1948 से 17 सितम्बर 1948 तक चला |

भारत के तत्कालीन गृहमंत्री एवं 'लौह पुरूष' सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा पुलिस कार्रवाई करने हेतु लिए गए साहसिक निर्णय ने निजाम को 17 सितम्बर, 1948 को आत्म-समर्पण करने और भारत संघ में सम्मिलित होने पर मजबूर कर दिया।

इस कार्यवाई को 'आपरेशन पोलो' नाम दिया गया था। इसलिए शेष भारत को अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता मिलने के बाद हैदराबाद की जनता को अपनी आजादी के लिए 13 महीने और 2 दिन संघर्ष करना पड़ा था।

यदि निजाम को उसके षड़यंत्र में सफल होने दिया जाता तो भारत का नक्शा वह नहीं होता जो आज है।

वो फ़ोन आज भी संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है |

Sunday, June 2, 2013

एक छोटी सी जानकारी


वेदो के बारे मे तथाकथित दलित विचारक कहते है की वेद पढने का अधिकार कभी शुद्रो को नही था. खैर ये क्या कहते है क्या नही कहते उससे कोई खास फर्क तो नही पङता पर उन महान शुद्र विद्वानो के नाम बताना मै जरुरी समझता हुं जिन्होने वेद लिखने मे अहम भूमिका अदा की.
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1- आचार्य कवस 2- एलुस 3- महिदास 4- ऐतरेय 5- दीर्घतमा 6- औशिज 7- काच्छीवान 8- वत्स 9- काण्वायन 10- सुदछिनच्छेमि 11- रैक्यमुनि 12- सत्यकाम 13- जाबाल
इन सब महान विद्वानो के चरणो मे कोटि कोटि नमन..
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वे आर्य जो न तो वैश्य थे न च्छत्रिय थे वो या तो ब्राह्मण थे या शुद्र थे. वे ब्राह्मण जो अध्ययन के बजाय शिल्प कार्य मे लगे उन्हे शुद्र कहा गया. ( तो क्या ब्राह्मण और शुद्र एक उत्पत्ति के नही हुए???मतलब ब्राह्मण और शुद्र एक ही हैं.) - रिगवेद मण्डल सात सुक्त 32 मंत्र 20
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जो ब्राह्मण वेद पठन पाठन नही करते कराते, अन्यत्र श्रम करते है वे और उनके तत्कालीन वंशज शुद्र होते है. - मनुस्मृति
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महान वैदिक संस्कृति और सभ्यता मे कमी वही निकाल सकते हैं जिन्होने कभी इसका अध्ययन भी नहीं किया हैं ऐसे म्लेच्छो से हम सभी को सावधान रहना चाहीये जो हम लोगो को बाटने के लिये झुठ का सहारा लेते है.कोई भी ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शुद्र जन्म के आधार पर नहीं हो सकता."कर्म" ही इसका पैमाना है,अगर ब्राह्मण शूद्रों की तरह काम करता है तो वह शुद्र है और शुद्र ब्राह्मण की तरह तो वह ब्राह्मण.यही हमारे वेदों की शिक्षा है.इसको तोड़ मरोड़ कर पेश करने वाले तथाकथित ब्राह्मणों और इसे दलित विरोधी बताने वाले स्वयंभू दलित विचारकों से ही महान वैदिक धर्म को खतरा है.

Saturday, June 1, 2013

कहीं देश न जला दे वोटबैंक की राजनीति!

अभी-अभी खबर पढ़ी है की उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार अपने जगजाहिर "आतंकवादी प्रेम" पर एक और  ठप्पा लगते हुए वाराणसी के विश्व विख्यात संकटमोचन मंदिर और कैंट रेलवे स्टेशन पर सात मार्च, 2006 को हुए आतंकी हमले के आरोपी शमीम के खिलाफ चल रहे मुकदमे को वापस लेने का निर्णय ले लिया है।जैसा की आप जानते हैं की सात मार्च, 2006 को संकट मोचन व कैंट रेलवे स्टेशन पर हुए श्रृंखलाबद्ध विस्फोट के बाद दशाश्वमेध इलाके में भी डेढ़सी पुल के नजदीक एक कुकर बम बरामद हुआ था, जिसे पुलिस ने निष्क्रिय कर दिया था। जांच के दौरान पुलिस व एसटीएफ ने इलाहाबाद के वलीउल्लाह को गिरफ्तार किया था। पूछताछ व सर्विलांस से मिली जानकारी में चंदौली निवासी शमीम अहमद का भी नाम सामने आया।इस सीरियल धमाके में २७ लोग मारे गए थे और दर्शनो घायल हो गए थे.तो क्या अब हमारी राजनितिक पार्टियाँ वोट के लए इतने निचे तक गिर गयी हैं  की आतंकवादियों-देशद्रोहियों को जेल से छोड़ रही हैं और जैसा की अभी कुछ दिन पहले की ख़बरों के मुताबिक एक सिरिअल ब्लास्ट के आरोपी की लू से मौत पर ६ लाख का मुआवजा भी इसी सरकार ने दिया था.अगर इन आतंकवादियों का कोई गुनाह नहीं था तो तमाम सुरक्षा एजेंसियों ने इन्हें पकड़ा ही क्यूँ?या समाजवादी पार्टी की सरकार आते ही सारे आतंकी निर्दोष क्यों हो जाते हैं?ये मनन-चिंतन का विषय है.यूपी की जातिवादी जनता को भी सोचना चाहिए,आखिर जातिवाद के नाम पर इन आतंकवादी विचारधारा की पोषक सरकारों को कब तक सत्ता देंगे?आज स्वर्ग में बैठ कर समाजवाद के प्रणेता राम मनोहर लोहिया की भी आत्मा रो रही होगी की मैंने तो समाजवादी पार्टी बनायीं थी और हमारे अनुयायी इसे नमाज़वादी पार्टी बना दिए.यहाँ एक तथ्य स परिचित कराना और जरूरी है की सपा का यह आतंकवादी प्रेम सिर्फ मुस्लिम वोटबैंक के लिए है लेकिन शायद वो भूल रहे हैं की जिस हमले के दोषी को ये छोड़ रहे हैं उसी हमले में ३ मुसलमान भी मरे थे.लेकिन इससे इनको फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इन्हें तो कुछ ऐसा दिखाना है जिससे इनका मुस्लिम प्रेम उजागर हो.

Thursday, May 16, 2013

ब्रेकिंग न्यूज़


यदि 2014 में कांग्रेस चुनाव जीत जाय तो ब्रेकिंग न्यूज ऐसे हुआ करेंगी -

ब्रेकिंग न्यूज़ - दूध पर लगा बैन अब पीना होगा खून
ब्रेकिंग न्यूज़ - फेसबुक परलगा बैन, सरकार चलाएगी अपनेअखबार
ब्रेकिंग न्यूज़ - शाकाहरी भोजन पर लगेगा tax
ब्रेकिंग न्यूज़ - चीन को सौंपा जाएगा अरुणाचल प्रदेश
ब्रेकिंग न्यूज़ - पाकिस्तान को सौंपा जाएगा आधा कश्मीर ..अब होगी दोस्ती
ब्रेकिंग न्यूज़ - हिन्दू महिला का रेप करने की मुसलमान को होगी आज़ादी (ये क़ानून साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक में कांग्रेस ने शामिल किया है,जिसे अभी पेश नहीं कर पाई है )

यदि 2014 में मोदी की जीत होती है तो

ब्रेकिंग न्यूज़ - सीबीआई नेगिरफ्तार किये सभी केंद्रीय मंत्री, दिग्विजय सिह को हवाई अड्डे पर पाकडागया
ब्रेकिंग न्यूज़- पाक अधिकृत कश्मीर में सेना का ओपरेशन, मारे गए सैंकड़ो आतंकी
ब्रेकिंग न्यूज़ -भारत की सीमा चारो और से सील,,चीन हटा पीछे ..
ब्रेकिंग न्यूज़ -पूरे भारत में अस्त्र शास्त्र बनाने कलिए फैक्ट्री खोली गई.. बड़े पैमाने पर युवाओं की सेना में भरती, रक्षा अनुसन्धान के लिए क़ानून पारित
ब्रेकिंग न्यूज़ - नरेन्द्र मोदी ने काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया...भारत को शुरू में 100 लाख करोड़ रूपया मिला वापस
ब्रेकिंग न्यूज़- पेट्रोल 40 रूपए सस्ता हुआ, डीज़ल सरकार खुद बनाएगी, नहीं होगा आयात,,मिलेगा 10 रूपए में
ब्रेकिंग न्यूज़ - भारत में पहली बार ..योग्यता अनुसार रोजगार का अधिकार कानून पारित
ब्रेकिंग न्यूज़ -सब्सिडी समाप्त, गरीबो को मुफ्त ही मिलेगी gas, मध्यम वर्ग के लिए बनाए जाएंगे बायो gasप्लांट ...
ब्रेकिंग न्यूज़ - विदेशी कंपनियों से वापस लिए गए कोयला भण्डार ... अब बन सकेगीसस्ती बिजली, बाद में दी जाएगी मुफ्त !!
ब्रेकिंग न्यूज़ -बंगलादेशियो को भगाया जाएगा वापस, हिन्दू धर्म परशोध के लिए कमेटी गठित
ब्रेकिंग न्यूज़ -संस्कृत भारत की राष्ट्र भाषा घोषित, संस्कृत विद्वानों का पेनल गठित, किया जाएगा सरलीकरण !! सभी भारतीय भाषाओको मिलेगा अन्ग्रेजी से अधिक सम्मान !! ....... !!
मित्रो ये तो एक छोटा सा प्रस्तुती कारन है ...2014 के बाद भारत का इतिहास सदैवके लिए बदल जाएगा !! ऊपर जाएगा या नीचे ..ये भारत की जनता के कर्मो और वोटिंग वाले दिन किये जाने वाली हरकत पर निर्भर है !!

Sunday, April 14, 2013

कलम उठाकर क्रान्तिकाल का आग जलाना पड़ता है


मेरा भी मन करता है की लिखूं फुहारे सावन की
बिंदिया,काजल,कंगन,कुमकुम लिखूं किसी मनभावन की
पर जब भूखे प्यासे बच्चे सड़कों पर चीत्कार करें
कैसे कवितायेँ लिख दूं प्रेयसी और लोकलुभावन की
राजनीति जब गिर जाती है अपराधी के चरणों पर
पुलिस नहीं कुछ कर पाती है हत्या और अपहरणों पर
तब कवि को सत्ता का असली रूप दिखाना पड़ता है
कलम उठाकर क्रान्तिकाल का आग जलाना पड़ता है 

न्याय व्यवस्था जब गुंडों के हाथों में बिक जाती है
और कश्मीर की घाटी लाशों से पट जाती है
देशद्रोहियों का जब-जब अभिनन्दन होने लगता है
तब-तब रंग बसंती वाला चोला रोने लगता है 
अफशरशाही जब सत्ता के चरणों पर गिर जाती है
और गीदड़ों की टोली शेरों को आँख दिखाती है
तब कवि को सत्ता का असली रूप दिखाना पड़ता है
कलम उठाकर क्रान्तिकाल का आग जलाना पड़ता है 

जब जनसेवक जनता को ही गाली देने लगते हैं
और विदेशी सौदों पर दलाली लेने लगते हैं
राष्ट्रवाद जब सिमित हो जाता हिन्दू हित के नारों तक
और सेकुलर की परिभाषा आतंकी छुडवाने तक
वोट बैंक की राजनीति जब देश जलाने लगती है
और राम की उपस्थिति पर हाथ उठाने लगती है
तब कवि को सत्ता का असली रूप दिखाना पड़ता है
कलम उठाकर क्रान्तिकाल का आग जलाना पड़ता है 

युवा शक्ति जब मदिरा के बोतल में गुम हो जाती है
और पश्चिमी सोच हमारी संस्कृति को खा जाती है
शाहरुख़ को जब आदर्शों सा युवा मानने लगता है
अशफाकुल्ला की फांसी पर धूल डालने लगता है
लालबहादुर गुम हो जाते इतिहासों की यादों में
जनता मुर्ख बनी रहती है नेताओं के वादों में
तब कवि को सत्ता का असली रूप दिखाना पड़ता है
कलम उठाकर क्रान्तिकाल का आग जलाना पड़ता है 

Thursday, April 11, 2013

धर्मनिरपेक्षता बनाम शर्मनिरपेक्षता


मित्रों!आज कल धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा एक धर्म विशेष के विरोध तक सीमित हो गयी है.अगर आप हिन्दुओं की बात करते हैं तो सांप्रदायिक हैं और ......की तो धर्मनिरपेक्ष.पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों की बात हो या बांग्लादेश और न्यामार से आये मुसलमानों की.दोनों के मामले में धर्मनिरपेक्षता के अलग-अलग तराजू हैं,बांग्लादेशी घुसपैठियों को नागरिकता देने की जल्दी है,पाकिस्तानी शरणार्थी हिन्दुओं की पीड़ा अनदेखी की जा रही है.मै आभार प्रकट करता हूँ कुछ प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मिडिया की जिन्होंने इस मुद्दे को लोगों के सामने लाने की हिम्मत की और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और मानवाधिकार आयोगों की अप्रत्यक्ष रूप से कलई खोल दी.हाल के कुछ वर्षों में घटित कुछ शर्मनिरपेक्ष(मै इसे धर्मनिरपेक्ष नहीं कह सकता) बयानों की कड़ियाँ आपको प्रस्तुत कर रहा हूँ.निर्णय स्वयं आप को लेना है.यह धर्मनिरपेक्षता है या शर्म निरपेक्षता है.
जरा इनके बयानों का विरोधाभास देखिये....
हजारों सिखों का कत्लेआम – एक गलती
कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार – एक राजनैतिक समस्या
गुजरात में कुछ हजार लोगों द्वारा मुसलमानों की हत्या – एक विध्वंस
बंगाल में गरीब प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी – गलतफ़हमी
गुजरात में “परजानिया” पर प्रतिबन्ध – साम्प्रदायिक
“दा विंची कोड” और “जो बोले सो निहाल” पर प्रतिबन्ध –धर्मनिरपेक्षता
कारगिल हमला – भाजपा सरकार की भूल
चीन का 1962 का हमला – नेहरू को एक धोखा
जातिगत आधार पर स्कूल-कालेजों में आरक्षण – सेक्यूलर
अल्पसंख्यक संस्थाओं में भी आरक्षण की भाजपा की मांग – साम्प्रदायिक
सोहराबुद्दीन की फ़र्जी मुठभेड़ – भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा
ख्वाजा यूनुस का महाराष्ट्र में फ़र्जी मुठभेड़ – पुलिसिया अत्याचार
गोधरा के बाद के गुजरात दंगे - मोदी का शर्मनाक कांड
मेरठ, मलियाना, मुम्बई, मालेगाँवमथुरा,फैजाबाद,पश्चिम बंगाल  आदि-आदि-आदि दंगे - एक प्रशासनिक विफ़लता
हिन्दुओं और हिन्दुत्व के बारे बातें करना – सांप्रदायिक
इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बातें करना – सेक्यूलर
संसद पर हमला – भाजपा सरकार की कमजोरी
अफ़जल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सालों तक टाले रखना – मानवीयता
भाजपा के इस्लाम के बारे में सवाल – सांप्रदायिकता
कांग्रेस के “राम” के बारे में सवाल – नौकरशाही की गलती
यदि कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती – सोनिया को जनता नेस्वीकारा
मोदी गुजरात में चुनाव जीते – फ़ासिस्टों की जीत
सोनिया मोदी को कहती हैं “मौत का सौदागर” – सेक्यूलरिज्म को बढ़ावा
जब मोदी अफ़जल गुरु के बारे में बोले – मुस्लिम विरोधी !

Sunday, March 31, 2013

अविश्वसनीय किन्तु सत्य


आप माने या न माने लेकिन हमारे देश में मरने के बाद भी तीन दशकों से एक सिपाही सरहदों की रक्षा कर रहा है। इस सिपाही को अब लोग कैप्टन बाबा हरभजन सिंह के नाम से पुकारते हैं।

4 अक्टूबर 1968 में सिक्किम के साथ लगती चीन की सीमा के साथ नाथुला पास में गहरी खाई में गिरने से मृत्यु हो गई थी। लोगों का ऐसा मानना है कि तब से लेकर आज तक यह सिपाही की आत्मा सरहदों की रक्षा कर रही है। इस बात पर हमारे देश के सैनिकों को पूरा विश्ववास तो है ही लेकिन चीन के सैनिक भी इस बात को मानते हैं क्योंकि उन्होंने कैप्टन बाबा हरभजन सिंह को मरने के बाद घोड़े पर सवार होकर सरहदों की गश्त करते हुए देखा है। कैप्टन हरभजन सिंह का जन्म 3 अगस्त 1941 को पंजाब के कपूरथला जिला के ब्रोंदल गांव में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1966 में 23वीं पंजाब बटालियन ज्वाइन की थी। वह सिक्किम जब 4 अक्टूबर 1968 में टेकुला सरहद से घोड़े पर सवार होकर अपने मुख्यालय डेंगचुकला जा रहे थे तो वह एक तेज बहते हुए झरने में जा गिरे और उनकी मौत हो गई। उन्हें पांच दिन तक जीवित मानकर लापता घोषित कर दिया गया था। पांचवें दिन उनके साथी सिपाही प्रीतम सिंह को सपने में आकर मृत्यू की जानकारी दी और बताया की उनका शव कहां पड़ा है। उन्होंने प्रीतम प्रीतम सिंह से यह भी इच्छा जाहिर की कि उनकी समाधि भी वहीं बनाई जाए। पहले प्रीतम सिंह कि बात का किसी ने विश्वास नहीं कि लेकिन जब उनका शव उसी स्थल पर मिला जहां उन्होंने बताया था तो सेना के अधिकारियों को उनकी बात पर विश्वास हो गया। और सेना के अधिकारियों ने उनकी छोक्या छो नामक स्थान पर उनकी समाधि बना डाली। उनके आज भी रात को ही जवान वर्दी को प्रेस कर देते हैं उनके जूतों को पॉलिश कर दिया जाता है क्योंकि ऐसी धारणा है कि उन्हें सुबह सरहद पर डयूटी पर जाना होता है। उनके कमरे में रोजाना सफाई की जाती है सरकार ने उन्हें मृत न घोषित करते हुए उनकी सेवाओं को जारी रखा, उनके परिवार के सदस्यों को पेंशन नहीं मिलती थी उनका वेतन उनके घर बाकायदा फौज के जवान देकर जाते थे। मरने के बाद बाबा कैप्टन बाबा को सेना के अधिकारियों ने सिपाही से पदोन्नत कर कैप्टन बना दिया। वह किसी न किसी तरह सीमा के पार होने वाली गतिविधियों की जानकारी आज भी सेना के अधिकारियों को दे देते हैं। अब काफी समय के बाद सेना ने उनका वेतन बंद कर दिया है। हालांकि उनकी समाधि पर चढऩे वाला चढ़ावा उनके घर आज भी भिजवा दिया जाता है।


हर वर्ष उन्हें 15 सितंबर से 15 नंवबर तक वार्षिक छुट्टी पर जाना होता है। इस दौरान फौज के दो सिपाही उनका सामान लेकर घर जाते हैं और उनकी छुट्टी खतम होने पर उनका सामान वापस लेकर आते है। इस दौरान युनिट के सभी फौजियों की छुट्टियां रद्द कर दी जाती हैं। सिक्कम के लोग भगवान कंचनजुंगा के बाद दूसरा भगवान इन्हें मानते हैं।