स्वागतम ! सोशल नेटवर्किंग का प्रयोग राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए करें.

Free HTML Codes

अगरहो प्यार के मौसम तो हमभी प्यार लिखेगें,खनकतीरेशमी पाजेबकी झंकारलिखेंगे

मगर जब खून से खेले मजहबीताकतें तब हम,पिलाकर लेखनीको खून हम अंगारलिखेगें

Thursday, February 25, 2010

प्यार बांटते साई


प्राणिमात्र की पीडा हरने वाले साई हरदमकहते, मैं मानवता की सेवा के लिए ही पैदा हुआ हूं। मेरा उद्देश्य शिरडीको ऐसा स्थल बनाना है, जहां न कोई गरीब होगा, न अमीर, न धनी और न ही निर्धन..। कोई खाई, कैसी भी दीवार..बाबा की कृपा पाने में बाधा नहीं बनती। बाबा कहते, मैं शिरडीमें रहता हूं, लेकिन हर श्रद्धालु के दिल में मुझे ढूंढ सकते हो। एक के और सबके। जो श्रद्धा रखता है, वह मुझे अपने पास पाता है।
साई ने कोई भारी-भरकम बात नहीं कही। वे भी वही बोले, जो हर संत ने कहा है, सबको प्यार करो, क्योंकि मैं सब में हूं। अगर तुम पशुओं और सभी मनुष्यों को प्रेम करोगे, तो मुझे पाने में कभी असफल नहीं होगे। यहां मैं का मतलब साई की स्थूल उपस्थिति से नहीं है। साई तो प्रभु के ही अवतार थे और गुरु भी, जो अंधकार से मुक्ति प्रदान करता है। ईश के प्रति भक्ति और साई गुरु के चरणों में श्रद्धा..यहीं से तो बनता है, इष्ट से सामीप्य का संयोग।
दैन्यताका नाश करने वाले साई ने स्पष्ट कहा था, एक बार शिरडीकी धरती छू लो, हर कष्ट छूट जाएगा। बाबा के चमत्कारों की चर्चा बहुत होती है, लेकिन स्वयं साई नश्वर संसार और देह को महत्व नहीं देते थे। भक्तों को उन्होंने सांत्वना दी थी, पार्थिव देह न होगी, तब भी तुम मुझे अपने पास पाओगे।
अहंकार से मुक्ति और संपूर्ण समर्पण के बिना साई नहीं मिलते। कृपापुंजबाबा कहते हैं, पहले मेरे पास आओ, खुद को समर्पित करो, फिर देखो..। वैसे भी, जब तक मैं का व्यर्थ भाव नष्ट नहीं होता, प्रभु की कृपा कहां प्राप्त होती है। साई ने भी चेतावनी दी थी, एक बार मेरी ओर देखो, निश्चित-मैं तुम्हारी तरफ देखूंगा।
1854में बाबा शिरडीआए और 1918में देह त्याग दी। चंद दशक में वे सांस्कृतिक-धार्मिक मूल्यों को नई पहचान दे गए। मुस्लिम शासकों के पतन और बर्तानियाहुकूमत की शुरुआत का यह समय सभ्यता के विचलन की वजह बन सकता था, लेकिन साई सांस्कृतिक दूत बनकर सामने आए। जन-जन की पीडा हरी और उन्हें जगाया, प्रेरित किया युद्ध के लिए। युद्ध किसी शासन से नहीं, कुरीतियों से, अंधकार से और हर तरह की गुलामी से भी! यह सब कुछ मानवमात्र में असीमित साहस का संचार करने के उपक्रम की तरह था। हिंदू, पारसी, मुस्लिम, ईसाई और सिख..हर धर्म और पंथ के लोगों ने साई को आदर्श बनाया और बेशक-उनकी राह पर चले।
दरअसल, साई प्रकाश पुंज थे, जिन्होंने धर्म व जाति की खाई में गिरने से लोगों को बचाया और एक छत तले इकट्ठा किया। घोर रूढिवादी समय में अलग-अलग जातियों और वर्गो को सामूहिक प्रार्थना करने और साथ बैठकर चिलम पीने के लिए प्रेरित कर साई ने सामाजिक जागरूकता का भी काम किया। वे दक्षिणा में नकद धनराशि मांगते, ताकि भक्त लोभमुक्तहो सकें। उन्हें चमत्कृत करते, जिससे लोगों की प्रभु के प्रति आस्था दृढ हो। आज साई की नश्वर देह भले न हो, लेकिन प्यार बांटने का उनका संदेश असंख्य भक्तों की शिराओंमें अब तक दौड रहा है।
चण्डीदत्तशुक्ल

वीरता व बलिदान के प्रतीक गुरु


धर्म, संस्कृति व राष्ट्र की आन-बान और शान के लिए गुरु गोविन्द सिंह ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इतिहास में ऐसी वीरता और बलिदान कम ही देखने को मिलता है। इसके बावजूद इतिहासकारों ने इस महान शख्सियत को वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हकदार हैं। इतिहासकार लिखते हैं कि गुरु गोविन्द सिंह ने अपने पिता का बदला लेने के लिए तलवार उठाई। जिस बालक ने स्वयं अपने पिता को आत्मबलिदान के लिए प्रेरित किया हो, क्या संभव है कि वह स्वयं लडने के लिए प्रेरित होगा?
गुरु गोविन्द सिंह को किसी से वैर नहीं था, उनके सामने तो पहाडी राजाओं की ईष्र्या पहाड जैसी ऊंची थी, तो दूसरी ओर औरंगजेबकी धार्मिक कट्टरता की आंधी लोगों के अस्तित्व को लीलरही थी। ऐसे समय में गुरु गोविन्द सिंह ने समाज को एक नया दर्शन दिया-आध्यात्मिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए तलवार धारण करना। जफरनामा में स्वयं गुरु गोविन्द सिंह लिखते हैं- जब सारे साधन निष्फल हो जायें, तब तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है। धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु ही गुरु गोविन्द सिंह ने 1699ई.में खालसा पंथ की स्थापना की। खालसा यानिखालिस (शुद्ध), जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो। उन्होंने सभी जातियों के वर्ग-विभेद को समाप्त कर न सिर्फ समानता स्थापित की बल्कि उनमें आत्म-सम्मान और प्रतिष्ठा की भावना भी पैदा की। उन्होंने स्पष्ट मत व्यक्त किया-मानस की जात सभैएक है।
गुरु नानक देव जी ने जहां विनम्रता और समर्पण पर जोर दिया था, वहीं गुरु गोविन्द सिंह ने आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता का संदेश दिया। समानता के आधार पर स्थापित खालसा पंथ में वे सिख थे, जिन्होंने किसी युद्ध कला का कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं लिया था। सिखों में यदि कुछ था तो समाज एवं धर्म के लिए स्वयं को बलिदान करने का जज्बा।
गुरु गोविन्द सिंह का एक और उदाहरण उनके व्यक्तित्व को अनूठा साबित करता है-पांच प्यारे बनाकर उन्हें गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन जाते हैं और कहते हैं-जहां पांच सिख इकट्ठे होंगे, वहीं मैं निवास करूंगा। खालसा मेरोरूप है खास, खालसा में हो करो निवास। सेनानायक के रूप में पहाडी राजाओं एवं मुगलों से कई बार संघर्ष किया। युद्ध के मैदान में उनकी उपस्थिति मात्र से सैनिकों में उत्साह एवं स्फूर्ति पैदा हो जाती थी। चण्डी चरित में लिखा सवैया शूरवीरों का मंत्र बन गया था-देह शिवा वर मोहिएहैभुभकरमनतेकबहूंन टरौ,न डरो अरि सो जब जाइलरोनिसचैकर अपनी जीत करो।
जहां शिवाजी राजशक्ति के शानदार प्रतीक हैं, वहीं गुरु गोविन्द सिंह एक संत और सिपाही के रूप में दिखाई देते हैं। क्योंकि गुरु गोविन्द सिंह को न तो सत्ता चाहिए और न ही सत्ता सुख। उनका विषय तो शान्ति एवं समाज कल्याण था। अपने माता-पिता, पुत्रों और हजारों सिखों के प्राणों की आहुति देने के बाद भी वह औरंगजेबको फारसी में लिखे अपने पत्र जफरनामा में लिखते हैं- औररंगजेब तुझे प्रभु को पहचानना चाहिए तथा प्रजा को दु:खी नहीं करना चाहिए। कुरान की कसम खाकर तूने कहा था कि मैं सुलह रखूंगा, लडाई नहीं करूंगा, यह कसम तुम्हारे सिर पर भार है। तू अब उसे पूरा कर। गुरु गोविंद सिंह एक आध्यात्मिक गुरु के अतिरिक्त एक महान विद्वान भी थे। उन्होंने पाउन्टासाहिब के अपने दरबार में 52कवियों को नियुक्त किया था। जफरनामा एवं विचित्र नाटक गुरु गोविन्द सिंह की महत्वपूर्ण कृतियां हैं। वह स्वयं सैनिक एवं संत थे। इसी भावनाओं का पोषण उन्होंने अपने सिखों में भी किया। सिखों के बीच गुरु गद्दी को लेकर कोई विवाद न हो इसके लिए उन्होंने गुरुग्रन्थ साहिब को गुरु का दर्जा दिया। इसका श्रेय भी प्रभु को देते हुए कहते हैं-आज्ञा भई अकाल की तभी चलाइयोपंथ, सब सिक्खनको हुकम है गुरू मानियहुग्रंथ।
गुरुनानक की दसवीं जोत गुरु गोविंद सिंह अपने जीवन का सारा श्रेय प्रभु को देते हुए कहते है-मैं हूं परम पुरखको दासा, देखन आयोजगत तमाशा। ऐसी शख्सियत को शत-शत नमन।
(सुरजीत सिंह गांधीद्वारा साभार)

Monday, February 22, 2010

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय


मै शंकर का वह क्रोधानल,कर सकता जगती क्षार-क्षार.
मै डमरू की वह प्रिय ध्वनि हूँ,जिसमे नाचता भिसन संहार.
रणचंडी की अतृप्त प्यास,मै दुर्गा का उन्मत्त हास.
मै यम की प्रलयंकर पुकार,जलते मरघट का धुआधार.
फिर अंतरतम की ज्वाला से,जगती में आग लगा दूं मै.
गर धधक उठे जल,थल-अम्बर,तो फिर इसमें कैसा विस्मय.
हिन्दू तन मन,हिन्दू जीवन,रग-रग हिन्दू मेरा परिचय.
मै आदि पुरुष निर्भयता का,वरदान लिए आया भू पर.
पय पीकर सब मरते आये,लो अमर हुआ मै विष पीकर.
अधरों की प्यास बुझाई है,मैंने पीकर वो आग प्रखर.
हो जाती दुनिया भास्म्सार,जिसको पल भर में ही छूकर.
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन.
मै नर,नारायण-नीलकंठ,बन गया न इसमें कुछ संसय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मै अखिल विश्व का गुरु महान,देता विद्या का अमर दान.
मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग,मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान.
मेरे वेदों की ज्योति प्रखर,मेरे वेदों का ज्ञान अमर.
मानव के मन अंधकार,या हो सामने सत्य सहर.
मेरे स्वर नभ में घहर-घहर,सागर के जल में फहर-फहर.
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मय
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मय तेज पुंज तम्लीन जगत में,फैलाया मैंने प्रकाश.
जगती का रच कर के विनाश,कब चाह है खुद का विकाश?
सरणागत की रक्षा की है,मैने अपना जीवन देकर.
विश्वाश अगर नहीं आता तो,साक्षी है इतिहास अमर.
यदि आज बनारस के खंडहर,सदिओं की निद्रा से जगकर.
हुंकार उठे हिन्दू की जय,तो फिर इसमें कैसा विस्मय?
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
दुनिया के वीराने पथ पर,जब-जब नर ने खायी ठोकर.
दो आंशु शेष बचा पाया,जब मानव ने सबकुछ खोकर.
मै आया तभी द्रवित होकर,मै आया ज्ञान दीप लेकर.
भूला भटका मानव पथ पर,चल निकला सोते से जगकर.
पथ के आवर्तों से थक-कर,जब बैठ गया मानव पथ पर.
उस नर को राह दिखाना ही,मेरा सदैव का दृढ़ निश्चय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मैंने छाती का लहू पिला,पाले विदेश के सृजित लाल.
मुझको मानव में भेद नहीं,मेरा अन्तःस्थल वर विशाल.
जग से ठुकराए लोगों को,लो मेरे घर का खुला द्वार.
अपना हूँ सबकुछ लुटा चूका,फिर भी अक्षय है धनागार.
मेरा हीरा पाकर ज्योतित,परीकिओं का वह राजमुकुट.
इन चरणों पर अगर झुक जाये,कल वह कीरीट तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मै वीर पुत्र मेरे जननी के जगती में जौहर अपार.
अकबर के पुत्रों से पूछो,क्या याद उन्हें मीना बाज़ार?
क्या याद उन्हें चितौड दुर्ग में जलने वाली आग प्रखर?
जब हाय सहस्त्रों माताएं,तिल-टिक जलकर हो गयी अमर.
वो बुझने वाली आग नहीं,रग-रग में उसे समाये हूँ.
यदि कभी अचानक फूट पड़े,विप्लव लेकर तो क्या संशय?
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
होकर स्वतंत्र मैंने कब चाह,कर लूं सरे जग को गुलाम?
मैंने तो सदा सिखाया है,करना अपने मन को गुलाम.
गोपाल-राम के नमो पर मैंने कब अत्याचार किया?
कब दुनिया को हिन्दू करने,घर-घर में नरसंहार किया?
कोई बतलाये काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी?
भूभाग नहीं,शत-शत मानव का ह्रदय जितने का निश्चय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मै एक विन्दु,परिपूर्ण सिन्धु है,यह मेरा हिन्दू समाज.
मेरा इसका सम्बन्ध अमर,मै ब्यक्ति और यह है समाज.
इससे मैंने पाया तन-मन,इससे मैंने पाया जीवन.
मेरा तो बस कर्त्तव्य यही,कर दूं इसको सबकुछ अर्पण.
मै तो समाज की थाती हूँ,मै तो समाज का हूँ सेवक.
मै हिन्दू हित के लिए सदा,कर दूं खुद का बलिदान अभय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.