सुबह-सुबह राजू मंदिर पूजा करने निकला.पापा बोले
- "कहाँ जा रहे हो राजू सुबह सुबह नहा धोकर?"
- "मंदिर जा रहा हूँ पापा पूजा करने."
- "रुक जा अभी २ मिनट."
(पापा घर में से एक सफ़ेद टोपी लाकर राजू को पहना देते हैं)
- "पापा ये क्या पहना रहे हैं?मई मुसलमान थोड़े ही हूँ."
- "जनता हूँ पगले.तेरा बाप हूँ.पूरे देश में हिन्दू आतंकवाद का हल्ला मचा हुआ है और मंदिर के रस्ते में राहुल गाँधी कई सभा भी है.जा रस्ते में कोई बड़ा मिले तो अत-सलाम-वालेकुम बोल देना."
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"राजू,बेटा स्कूल से वापस क्यों चला आया."
"पापा मुझे नहीं पढना है."
"मुरख,पढ़ेगा नहीं तो क्या करेगा?नौकरी नहीं मिलेगी.भूखा मरेगा."
"भूखा मरे मेरा बाप.मई तो कश्मीर जाऊंगा.लोगों के साथ सेना के जवानों को चक्का मरूँगा.एक दो को टपकाउंगा.थोडा बहुत खुद को चोट लगा लूँगा.सर्कार ५ लाख देगी .ऐश करूँगा."
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"राजू बेटा ,तेरी गर्मी की छुट्टियाँ हो रही हैं.चलेगा मेरे साथ कश्मीर घुमने.?"
"क्या पापा,झूठे सपने दिखाते हो.पागल समझ रखा है क्या?"
"क्या हुआ रे,सही हम जा रहे हैं दोस्तों के साथ."
"पापा मई तो छह के भी नहीं जा सकता.पासपोर्ट नहीं है मेरे पास,और आप भी खुश मत होइए,आप भी नहीं जा पाएंगे.उमर अब्दुल्ला ने अब भारतीयों के लिए वीजा देना बंद कर दिया है.अब लाल चौक पर पाकिस्तान का झंडा लगाने वाले हैं."
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(राजू दौड़ता हफ्ता घर के अन्दर आता है)
"क्या हुआ बेटा राजू?इतना घबराये हुए क्यूँ हो?"
"पापा बाहर आतंकवादी खड़ा है और आपको बुला रहा है."
"आतंकवादी?"(पापा बाहर आते हैं.)
"पापा पहचाना नहीं इनको ,अपने गुरूजी हैं."
"पर इन्होने तो भगवा कपडा पहन रखा है."
Monday, January 10, 2011
Thursday, January 6, 2011
क्षमा की मूर्ति सर्वदेवमयी गोमाता

एक बार की बात है इन्दौर नगर के किसी मार्ग के किनारे एक गाय अपने बछड़े के साथ खड़ी थी, तभी देवी अहिल्याबाई के पुत्र मालोजीराव अपने रथ पर सवार होकर गुजरे । मालोजीराव बचपन से ही बेहद द्यारारती व उच्छृंखल प्रवृत्ति के थे । राह चलते लोगों को परेशान करने में उन्हें विशेष आंनद आता था । गाय का बछड़ा अकस्मात उछलकर उनके रथ के सामने आ गया । गाय भी उसके पीछे दौड़ी पर तब तक मालोजी का रथ बछड़े के ऊपर से निकल चुका था । रथ अपने पहिये से बछड़े को कुचलता हुआ आगे निकल गया था । गाय बहुत देर तक अपने पुत्र की मृत्यु पर शोक मनाती रही । तत्पष्चात उठकर देवी अहिल्याबाई के दरबार के बाहर टंगे उस घण्टे के पा जा पहुँची, जिसे अहिल्याबाई ने प्राचीन राजपरम्परा के अनुसार त्वरित न्याय हेतु विशेष रूप से लगवाया था। अर्थात् जिसे भी न्याय की जरूरत होती,वह जाकर उस घन्टें को बजा देता था। जसके बाद तुरन्त दरबार लगता तुरन्त न्याय मिलता । घन्टें की आवाज सुनकर देवी अहिल्याबाई ने ऊपर से एक विचित्र दृश्य देखा कि एक गाय न्याय का घन्टा बजा रही है । देवी ने तुरन्त प्रहरी को आदेश दिया कि गाय के मालिक को दरबार में हाजिर किया जाये। कुछ देर बाद गाय का मालिक हाथ जोड़ कर दरबार में खड़ा था। देवी अहिल्याबाई ने उससे कहा कि '' आज तुम्हारी गाय ने स्वंय आकर न्याय की गुहार की है । जरूर तुम गो माता को समय पर चारा पानी नही देते होगें। '' उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर कहा कि माते श्री ऐसी कोई बात नही है । गोमाता अन्याय की शिकार तो हुई है ,परन्तु उसका कारण में नही कोई ओर है, उनका नाम बताने में मुझे प्राणो का भय है ।'' देवी अहिल्या ने कहा कि अपराधी जो कोई भी है उसका नाम निडर होकर बताओं ,तुम्हे हम अभय -दान देते है। '' तब उस व्यक्ति ने पूरी वस्तुस्थित कह सुनायी । अपने पुत्र को अपराधी जानकर देवी अहिल्याबाई तनिक भी विचलीत नही हुई। और फिर गोमाता स्वयं उनके दरबार में न्याय की गुहार लगाने आयी थी। उन्होने तुरन्त मालोजी की पत्नी मेनावाई को दरबार में बुलाया यदि कोई व्यक्ति किसी माता के पुत्र की हत्या कर दें ,तो उसे क्या दण्ड मिलना चाहिए ? मालो जी की पत्नी ने कहा कि ÷ जिस प्रकार से हत्या हुई, उसी प्रकार उसे भी प्राण-दण्ड मिलना चाहिए। देवी अहिल्या ने तुरन्त मालोजी राव का प्राण-दण्ड सुनाते हुए उन्हें उसी स्थान पर हाथ -पैर बाँधकर उसी अवस्था में मार्ग पर डाल दिया गया। रथ के सारथी को देवी ने आदेश दिया ,पर सारथी ने हाथ जोड़कर कहा '' मातेश्री ,मालोजी राजकुल के एकमात्र कुलदीपक है। आप चाहें तो मुझे प्राण -दण्ड दे दे,किन्तु मे उनके प्राण नही ले सकता ।'' तब देवी अहिल्याबाई स्वंय रथ पर सवार हुई और मालोजी की ओर रथ को तेजी से दोड़ाया, तभी अचानक एक अप्रत्याशित घटना हुई। रथ निकट आते ही फरियादी गोमाता रथ निकट आ कर खड़ी हो गयी । गोमाता को हटाकर देवी ने फिर एक बार रथ दौड़ाया , फिर गोमाता रथ के सामने आ खड़ी हो गयी। सारा जन समुदाय गोमाता और उनके ममत्व की जय जयकार कर उठा। देवी अहिल्या की आँखो से भी अश्रुधारा बह निकलीं । गोमाता ने स्वंय का पुत्र खोकर भी उसके हत्यारे के प्राण ममता के वशीभूत होकर बचाये। जिस स्थान पर गोमाता आड़ी खड़ी हुई थी, वही स्थान आज इन्दौर में ( राजबाड़ा के पास) '' आड़ा बाजार के नाम से जाना जाता है।''
(राष्ट्रधर्म मासिक अक्टूबर २००९ से साभार)
Wednesday, January 5, 2011
अमरवीर नाथूराम गोडसे द्वारा लिखित आखिरी पत्र

प्रिय बंधो चि.दत्तात्रय वि. गोडसे ,
मेरे बीमा के रुपिया अगर आ जाएँ तो उस रुपिया का बिनिभोग आपके परिवार के कार्य के लिए करना.रुपिया २००० आपके पत्नी के नाम पर. रुपिया ३००० चि. गोपाल की धर्मपत्नी के नाम पर और रुपिया २००० आपके नाम पर.इसप्रकार बीमा के कागजों पर मैंने रुपिया मिलने के लिए लिखा है.
मेरी उत्तर क्रिया करने का अधिकार यदि आपको मिलेगा तो आप आपकी इच्छा से किसी प्रकार इस शुभ कार्य को संपन्न करना.लेकिन मेरी अंतिम विशेष इच्छा यहीं लिखता हूँ.
अपने भारतवर्ष की सीमा रेखा सिंधुनदी है. जिसके किनारे पर वेदों की रचना प्राचीन द्रष्टाओं ने की है.वह सिंधुनदी जिस शुभ दिन में फिर भारत वर्ष की ध्वज की छाया में स्वछंदता से बहती रहेगी उन दिनों मेरी अस्थिओं या रक्षा का कुछ छोटा सा हिस्सा उस सिंधुनदी में बहा दिया जाय.
मेरी यह इछ्चा सत्यसृष्टि में आने के लिए शायद और भी एक दो पिधिओं का समय लग जाय तो मुझे चिंता नहीं.उस दिन तक वह अवशेष वैसा ही रखो और आपके जीवन में वह शुभ दिन न आये तो आपके वारिशों को ये मेरी अंतिम इच्छा बतलाते जाना.
अगर मेरे न्यायलय वक्तव्य को सर्कार कभी वन्ध्मुक्त करेगी तो उसके प्रकाशन का अधिकार भी मै आपको दे रहा हूँ.
मैंने १०१ रुपिया आपको आज दिए हैं जो आप सौराष्ट्र सोमनाथ मंदिर का पुनरोद्धार हो रहा है उसके कलश कार्य के लिए भेज देना.
वास्तव में मेरे जीवन का अंत उसी समय हो गया था जब मैंने गाँधी पर गोली चलायी थी.उसके पश्चात मानो मै समाधी में हूँ और अनासक्त जीवन बिता रहा हूँ.
मै मानता हूँ की गाँधी जी ने देश के लिए बहुत कष्ट उठाये,जिसके लिए मै उनकी सेवा के प्रति और उनके प्रति नतमस्तक हूँ,किन्तु देश के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि का विभाजन करने का अधिकार नहीं था.
मै किसी प्रकार की दया नहीं चाहता और नहीं चाहता हूँ की मेरी ओए से कोई दया याचना करे.
आपने देश के प्रति भक्तिभाव रखना अगर पाप है तो मै स्वीकार करता हूँ की वह पाप मैंने किया है.अगर वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य पद पर मेरा नम्र अधिकार है.
देश भक्ति को पाप कहें यदि
मै हूँ पापी घोर भयंकर
किन्तु रहा वो पुण्य कर्म तो
मेरा है अधिकार पुण्य पर
अचल खड़ा मै इस वेदी पर
मेरा विश्वाश अडिग है,नीति की दृष्टि से मेरा कार्य पूर्णतया उचित है.मुझे इस बात पर लेशमात्र भी संदेह नहीं है की भविष्य में सच्चे इतिहासकार इतिहास लिखेंगे तो मेरा कार्य उचित ठहराएंगे.
आपका सुभेच्च्हू
नाथूराम वि. गोडसे
१४-११-४९
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